प्रेम गीत!! मिलन का विश्वास अक्षयवट हुआ है ॰॰॰॰ दर्द पूरा गा रहा हूँ और आधा प्यार... डूब जाते,गीत ही केवट हुआ है॰॰॰॰ अर्घ्य चाहों के लिए प्यासी नदी ! रूप में खुलकर नयन में जा मुदी !! दो नयन जोगी जनम के ,हेरते हैं द्वार... प्रेम ही तो जोगियों का हठ हुआ है ॰॰॰ निभ कहाँ पाये तुम्हारे दो वचन! डबडबाये फिर नहाये दो नयन !! बिन पढे जो पत्र लौटाया,बरोठे पार... रोज आँखे डूबने का तट हुआ है ॰॰॰॰ दाग तुमने,जिन्दगी,की बाँसुरी! भर नयन हर द्वार वो गाती फिरी !! सौ तरह ,दुनिया करे,सौ सौ जतन.... मिलन का विश्वास अक्षयवट हुआ है प्रेम गीत--23 : जान पाया तुम बड़ी प्यासी नदी हो!!!!! फेर कर कंगन हरे ओ प्राणधन , कौन सा जीता किला तुमने॰ गन्ध गोबर की तुम्हें बेचैन करती...